9/27/2014

मेलवा के रंग,संग पेटवा के भूख

आज मेरे घर चुल्हा नहीं जला                                       
मै तो ख़ुश हूँ,बाहर लगे मेले हैं
फिर माँ के माथे पे
क्यों ये लकीरें हैं।                                                                  
कल जब जलेबी मांगा था तो
बाऊ ने कहा था जलेबी खाओगे तब
खनमा किस पेट मे खाओगे।
मैंने कल से ही सोच रखा है
क्या-क्या मैं मेले में खाऊँगा,
दम भर ठूँस कर जलेबी खाऊँगा  
जब मिठका से अघा जाऊंगा,
तब फूचका से मुँहा के स्वादवा बदलूँगा
फिर कुछ रंगल लेमानचुसवा लूँगा,
खूब देर चूस-चूस जीभ लाल-हारा करूंगा
फिर शान से जीभ निकालूँगा
कल सरवा ललन खूब चिढ़ाया था,
आज मै उसे खूब चिढ़ाऊंगा।
मै उत्सुक जिज्ञासा की परिधि में घिरा
उछल-कूद माँ-बाऊ के पास जाता
कब चल रहें हैं हम मेलें में
हर घड़ी बदलती,
मैं अनुमान लगाता रहा।
मैं ख़ुश हूँ फिर भी बहुत,
बाहर लगे मेले हैं।
मेरी आवाज अब भर्राने को थी
सब्र का बाँध अब टूटने को था
कोमल मन अब पिता से रूठने को था
मेले जाने की इच्छा पे अब,
पेट की भूख जीतने को थी
तभी घर मे हलचल बढ़ी
माँ भन्सा-घर की ओर बढ़ी
मै सरपट भागा उन्हे रोकने को  
माँ आज चूल्हा मत जलाओ,
आज कम से कम आराम तो करलो
मै अभी भूखा नहीं,
बाहर लगे मेले हैं
भले ही संझिया को चलना
मै इंतज़ार कर लूँगा
तभी माँ भन्सा-घर से बाहर निकली
मेरे चेहरे की दमक बढ़ने लगी
फिर माँ के माथे पे
क्यों ये लकीरें हैं।                                       
                      




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9/24/2014

"ड्स्ट्बीन के सहारे स्वर्ग"

तुम गरीब क्यों जिंदा हो,अमीर शर्मिंदा है

तुम कुड़े भी चुरा लेते हो,अमीर शशांकित जीता है
ये तुम्हें कुड़े देकर अहसान न जता पाते है
तुम मे क्यों कुड़े चुराने का   हौसला है ।
अपनी तिजोरी को बचाने मोटे ताले बनाए है
तुम्हारे जीने की जीविवसा से डर कर
धर्म, पूर्व-जन्म के कर्म-फल के पहरे लगाए है
तुम्हारे हौसले पे अब क्यों न धर्म का पहरा है।
तुम भीख मांगते कितने अच्छे हो, कोई जेल-बेल नहीं है
मोटे बटुए को भी  धर्म कर कितना सकूँ मिलता है
सर झुका कर जियो भूखे तड़पो चाहे मर जाओ
मोटी तिजोरी को न देखो धर्म करो स्वर्ग जाओ ।
तुमने कुड़े चुरा कर घोर पाप किया है
मरने पर नर्क जीते जी घुट-घुट कर जेल जाओ
तुम गरीब क्यों जिंदा हो,अमीर शर्मिंदा है
तुम कुड़े भी चुरा लेते हो,ये अमीर शशांकित जीता है।
सहजादे की नजर उतरवाने हलुआ-पूरी तुम्ही तो खाते हो
और तुम्हारे लिए ही तो ड्स्ट्बीन मे पड़ा खाना है
फिर क्यों कुड़े चुराते हो,अमीर नाजुक धर्मी को डराते हो
वो कुड़े यूं भी तुम्हें दान कर देते कुछ तस्वीर खिचवाते
तुम्हारी गरीबी का बाज़ार सजता, कुछ तिजोरी भर जाती
अमीरज़ादे तुमपे प्रोजेक्ट-वर्क करते,कुछ टूटीपंक्तियाँ लिखते  
देखो न अदना सा “प्रशांत”भी कवि बन जाने को कैसे आतुर दिखता है।

9/08/2014

धुकधुकी

नारी आज भी तुमको छूपना पड़ता है,
हो निर्णय तुम्हारा कितना भी उचित
सवालों से वार किया जाता है.
अँधियारे मे गर तुम रोशनी बन चमक जाती हो,
तुम्हारी चमक को बुझाकर फिर से जलाया जाता है.

नारी आज भी तुम्हारी आजादी अपनी नहीं है,
तुम से अधिक महत्व हिजाब को दिया जाता है.
कुमकुम तेरे माथे पे सजाया जाता है,
तेरी मासूमियत पाजेब की जंजीरों से बंधा जाता है.
तेरी धुकधुकी बनी रहे हमेशा,जाल फ़ैलाया जाता है। 


7/07/2013

''तुम सब लड़ो दोनों देशद्रोही सत्ता में रहेंगे''

अयोध्या में मन्दिर मेरे खून पे बनेगा
अयोध्या में मस्जिद मेरे खून पे बनेगा
एक तुम से तेरा खुदा मंगता  है
एक तुम से तेरा राम-लल्ला मंगता है
दोनों आपस में कभी ना लड़ेंगे
तुम सब लड़ो दोनों देशद्रोही सत्ता में रहेंगे

अगर रख नही सकते अपने दिल में राम को
अगर रख नही सकते अपने दिल में खुदा को
तो अपने-अपने हिस्से का राम निकालो
आओ भाई तुम भी अपना खुदा लाओ
अपना-अपना बोझ तुम उतारो
राम भी भारी है अल्ला भी भारी
करने हैं जो सारे पाप पापी
कैसे ढो पओगे आपने साथ ये सारथी साथी

आओ अपने हिस्से का राम लाओ
आओ अपने हिस्से का खुदा निकालो
उसको अयोध्या में बिठा लाऊं
तुम सब लड़ो मुस्सल्मन मारो
तुम सब लड़ो हिंदू जलाओ 
रहने दो सत्ता में राम-खुदा के पापी.

जो रख सकते हो
अपने साथ अपना राम सारथी साथी
जो रख सकते हो
अपने साथ अपना खुदा  सारथी  साथी
लेकर घुमो अपने दिल में
अपना-अपना सारथी साथी
क्या करना तब अयोध्या या काशी

करने है हम सब को काम काफी
स्कूल बनवाने हैं ज्ञान फैलाने हैं
अस्पताल बनवाने हैं बंदों को सँवारने हैं
रोटी उपजानी है भूखों को खिलना है
हर आँगन में खुशी के फुल खिलने है
अभी खाना है कहाँ जो  चैन साथी
अपना राम अपना खुदा सारथी
तब क्यों देना इन रंगे सियारो को अपना हाथ साथी

अभी अगर आयें ये अल्ला-राम के सौदागर
सत्ता के लिए देश को गिरवी रखने वाले कायर
उनसे कह देना मेरा राम ले सको तो ले लो
उनसे कहना मेरा खुदा ले सको तो ले लो
वो तुम देशद्रोहियों से ना सम्हल सकेगें
उन्हें दिल में रहने कि आदत है
वो तेरे छोटे से मन्दिर में ना रह सकेंगे
उन्हें जन्नत जैसे वादियों में रहना है
वो तेरे खोटे से मस्स्जिद में क्या करेंगे
मानवता के दुश्मन अपने-अपने राम-खुदा निकालो
उसको मन्दिर में बिठाओ उसको मस्स्जिद में सजाओ
मेरा राम तो मुझको प्यारा है मेरा खुदा मुझको दुलरा है
उसको मन्दिर-मस्स्जिद कि आदत नही मेरे दिल कि आदत है
मै उसके बिना वो मेरे बिना  रह ना सकेगा

आओ लड़ने लड़ाने-वालों आपने-अपने हिस्से का खुदा- राम निकलाओं
आपस में लड़ो और मर जाओ
देश को अब बक्शो छूने दो बुलंदी को
जीने दो देश भक्तों को बनने दो विश्व-शक्ति
तेरे राम-खुदा हम अपने दिल में बसा लेंगें
तुम दोनों ना होगे तो पुरे देश को

मन्दिर-मस्जिद सा पवित्र हम बना देंगे.

6/14/2013

"गोपियाँ क्या करें "


गली गली हर चौराहे पर 
बाल बचपन ज़िन्दगी के दोराहे पर 
यहाँ हर कोई मुरलीवाला है 
अब गोपियाँ  बेचारी क्या करें 

किसके लिए सुध-बुध खोये 
किसको स्वामी मान मान जीवन सुख भोगे 
बड़ी व्यथा है बड़ी उलझन है 
एक नहीं अब यहाँ सभी गिरिधर हैं 

प्रश्न  उठता हो उनके भी मन में 
बदला है दौर अब वो क्या करे वृंदावन  में 
बदल गया है प्रेम बीते कल का वो क्या करे 
प्रेम की नई परिभाषा गढ़े या जिया बन जीवन त्याग करे 

बाँटने  को तो खुद को वो  बाट दे 
पर मन की  अधीरता क्या करे 
जब  तक ना मिले मन असली मोहन से 
वो हर नकली मोहन का क्या करे. 


2/01/2013

"शब्दों को मिटा दें "


आग उगलते शब्द 
शब्दों से ही जलते हम 
शब्द के सहारे हैं सारे 
प्यार भी है शब्द 
नफरत भी है शब्द 
हम से शब्द जाने हैं 
शब्दों के सहारे आज 
आओ नफरत की बात करें 
क्वाइसी शब्द को तोड़ें 
अहम का मुख मोड़ें 
ठाकरे शब्द को निचोड़ें 
भाजपा का सच घोलें 
गांधी को बताएं, सच बोलें 

आओ खुद को जला दे 
शब्दों को मिटा दे 
रूमानी गालियों को 
फड़फड़ाती धड़कनों के दर्द 
किस्मत औ उलफत की कहानियों को 
खुदा औ खुदा के डर 
गरीबी,लाचारी औ बेबसी 
लड़खड़ाती जुबानों की तन्हाइयों को 
धर्म का दंभ 
रिवाजो के बोझ 
समाज के बंधन
दम घोटते संस्कारों को। 

आओ मै औ तू मिटते है 
मै राम मिटता हु 
तू रहमान मिटाना 
मै हिन्द मिटाता हु 
तू पाक मिटाना ।
मै अपना मिटाता हु 
तू गैर मिटाना 
मै चुनाव मिटाता हूँ 
तू मतदान मिटाना ।
मै कानून मिटाता हु 
तू संविधान मिटाना।
मै तू मिटाता हु 
तू मै मिटाना ।

आओ इशारों मे बात करें
वादी को शब्द विहीन कर दें 
माथे के सिकन को समझें
मानवता की गर्माहट बिखरने दें  
कुलकुलाहट गूंजने दें 
धड़कन संगीत सुने 
साँसों की गहराइयों को जाने 
मुखरित अम्बक पहचाने
अमिय आमोद  पुष्प बिछाएँ 
धरित्री को विहार माने 
शब्दों को मिटा दें 
इन्सानों को जिंदा कर दें ।

1/03/2013

"क्या गिला मै क्या हूँ "


क्या पता मै कहाँ हूँ 
क्या गिला मै क्या हूँ 
वक़्त चलता जाए
मै बढ़ता जाऊँ
जब चाह मौन रहूँ 
जब मन रों दूँ 
जब चाह मै गाऊँ
जब  राह मिले चल पड़ूँ
क्यों राह को मैं जानूँ
क्यों वादा करूँ
क्यों आस रखूँ 
देखना हो राह अगर 
खुद का मै इंतजार करूँ
मै मदिरा पान करूँ 
या बिन पीये टल्ली हो जाऊँ
होना हो बहसी अगर 
खुद को मै गिल जाऊँ
क्यों व्यापार करूँ 
क्यों कोई सत्ता स्वीकार करूँ 
मै मस्त दरिया बन बहूँ 
पंछी बन उड़ जाऊँ 
मंजिल जिंदा रहे 
मै मिट जाऊँ

1/02/2013

"चाहत सर्वस्य अर्पण की "


रव ने मुझे दी है जितनी सासें 
तुझे देता हूँ 
अपना आज भी और कल भी देता हूँ 
जो वक़्त गुजरे तेरे बिना,क्षमा मांगता हूँ 

रव ने मुझे दी है जितनी खुशियाँ 
तुझे देता हूँ 
तेरे गम को अपना मानता हूँ 
जो गम तुझे मिले क्षमा मांगता हूँ 

रव ने मुझे दी है जितनी सफलता
तुझे देता हूँ
तेरी असफता अपना मानता हूँ
मिले सफलता तुझे मेरी भी
दुआ मांगता हूँ

जो कुछ मांग सकूँ खुदा से
जो वक़्त गुजरे तेरे बिना,वो वक़्त मांगता हूँ
जो न मिले किसी को तुझे मिले
तेरी मंगल कामना मांगता हूँ

मै तेरे आसूं बहाऊँ
तुम मुस्कुराती रहो,दुआ मांगता हूँ
तेरे गम को अपना मानता हूँ
जो गम तुझे मिले क्षमा मांगता हूँ

तेरे हिस्से का अंधेरा
मुझे मिल जाए
तेरे हिस्से आए दिया रोशनी का
जो अंधेरा तुझे मिले,क्षमा मांगता हूँ

जिंदा न रहूँ मर जाऊँ
अपनी रूह तुझे अर्पित करता हूँ
चाहत सर्वस्य अर्पण की
जो कुछ न कर सकूँ अर्पण क्षमा मांगता हूँ। 

12/21/2012

कब तक "प्रशांत "बहता


एक स्तित्व की तलाश मे 
बहार गुजर जाने के बाद
पतझड़ मे पत्ते ने कदम बढ़ाया
हरे बगीचे को छोड़ना चाहा 
पेड़ ने उसकी पीठ थपकाई
पेड़ की शाबाशी से हो अहलादित
पत्ते ने उड़ान भरी
पर, कब तक "प्रशांत" बहता 
पेड़ की भी एक सीमा थी
वो जमीन पर आ गिरा
माध्यम सी ब्यार बही
एक नवीन -ऊर्जा पत्ते ने महसूस किया
पत्ते ने फिर उड़ान भरी
यूं भी अब जीवन-सत्रोत नहीं था 
पत्ते को अब कहाँ 'नेह" मिलता
पत्ते को ये एहसास था
खड़खड़ाते हुये भी "प्रशांत" चल पड़ा था
पर,लड़खड़ाते ख्वाबों के सहारे
कब तक पते को सम्मान मिलता
पत्ते को भी मिटना था
यूं, तो "प्रशांत" ख्वाब था हरे बगीचे का। 
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11/19/2012

नीली वाली मेरी वाली

जब से तुम्हें देखा है

तुम मेरे लिए नीली वाली हो
हाँ उस दिन तेरे टॉप का रंग यही था
जब तूम अपनी सहेली के साथ जा रही थी
वो मेरे दोस्त की पीली वाली
हम दोनों ने तब से तुम्हें बाट लिया है
अब तुम मेरी वाली हो
उस दिन हम दोनों ने पार्टी किया था
नीली वाली तेरे लिए हमने पिया था
तुम्हें पता नहीं है तुम पे मेरे दोस्तों ने
मेरा कितना अधिकार दिया है
नीली वाली मुझे तेरा आशिक घोषित किया है
अब दोस्तों ने तुम्हें कहीं देख कर
मुझे बताना शुरू कर दिया है
आज तेरी वाली मिली थी
यार नई ड्रेश पहनी पहनी थी
बहुत मस्त लग रही थी
भाई न्यू पिंच,ट्रीट
अब सौपिंग तुम खूब करो
नीली वाली ट्रीट हमने देना शुरू कर दिया है
नीली वाली मेरी वाली
अब तुम मेरे दोस्तो की भाभी हो
तुम्हें तो पता भी नहीं है
मेरे दोस्तों ने सबों को समझाया है
नीली वाली अब इसकी है
कितने लड़कों को धमकाया है
नीली वाली से दूर रहो
सारे अपनी नियत साफ रखो
और भी बहुत सारीं हैं
ये लो सफ़ेद वाली तेरी
खुश रहो पार्टी दो
नीली वाली को भाभी समझो
नीली वाली मेरी वाली
तुम्हें पता नहीं है
सबों ने मिलकर मुझे प्यार करवा दिया है
मैंने तो तुम्हें सिर्फ देखा था
सबों ने उसे पहली नजर का प्यार जता दिया है
अब मुझे भी कुछ प्यार सा लगता है
अपने दिल मे तेरे लिए मर्म महसूस किया है
नीली वाली मै तुमसे प्यार करता हु
पीकर मैंनेदोस्तों के सामने इजहार किया है
अब दोस्तों ने परपोज करने का टिप्स
अपने अपने अंदाज मे देना शुरु कर दिया है
सबों के अंदाज़ मिलकर जब मैंने
तुम्हें परपोज करने का तरीका रखा है
सबसे जुदा अंदाज़ मेरा है
सबों ने मिलकर पार्टी मांगा है
नीली वाली मेरी वाली
जब तुम जानोगी, मुस्कुराओगी।
मै तुम्हें परपोज करने आ रहा था
नीली शर्ट पहन कर
नीली कवर से सजा गिफ्ट लेकर
तभी मेरे एक दोस्त ने
तेरे बॉय फ्रेंड होने की सूचना दी थी
मैंने अपनी नीली शर्ट की बटन तोड़ कर
तुमको खुद से ज़ुदा किया था
मै शिथिलमूकदर्द से भरा था
नीली वाली मेरी वाली मेरा प्यार अब शुरू हुआ था
और दोस्तों ने याद दिलाया था
यारउस दिन नीली और पीली वाली के साथ और
मैंने लाल वाली कह कर बात पूरा किया था
और सबने हँसते हुये
टूटे दिल का दर्द दफन किया था
हमने खूब पिया चेर्यस करते हुये लाल वाली को अपनाया था


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11/13/2012

"भारत महान "


आओ हम सब जयकार करें 
खाने को रोटी नहीं
बदन पे कपड़ा नहीं
भारत को महान कहें।

आधी आबादी वोट नहीं करती
वोट देना बेकार समझती
25% वोट से कम में हम जीतें
सबसे बड़े लोकतंत्र को सलाम कहें।

रोज हो रहें हैं दंगे
मंदिर-मस्जिद बनाएं
अंतर में नफरत से उबलते रहें
आपसी एकता की गुणगान करें।

धर्म का बाज़ार लगायें 
अल्लाह-राम नीलाम करें 
कुरान-वेद की देश में 
सभ्यता-संस्कृति की बखान करें।

देश की संपदा 100 में बाटें 
साइनिंग इंडिया का बोर्ड टांगे 
गरीब होने की शर्त घटाएं
A जो बोलना सीख लें
100%साक्षरता दर बताएं।

जो युवा काम मांगे 
जो भूखा खाना मांगे 
पैसे पेड़ों पर नहीं उगते 
आओ सबको पाठ पढाएं।

कोई लाल सलाम कहे 
उसे गाँधी की दुहाई दें 
उस पर 100 लोगों के लाकतंत्र का दबाब बनायें
आओ भारत को महान बताएं।

जो  दिल से आह निकले
उसे गद्दार बताएं
100 लोगों के महान देश में
पूरी आबादी भारत की जयकार करें।

भारत माता की जयघोष में
कहाँ थकता है भारतीय मन
दर्द तो ये है
भारत महान नहीं है
कभी भारत महान था।
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11/05/2012

"हे राधे तुम अपनी व्यथा सुनाओ "A love poem


हे राधे तुम अपनी व्यथा सुनाओ 
कैसे तुम कृष्ण वियोग में तड्पी होगी 
कैसे इस विछोह को तुमने झेला 
आंसू ना बहाने का वचन क्यों निभाया ?
आखिर तुमने क्या पाया? हमें बताओ 
हे राधे अपनी व्यथा सुनाओ।
क्या तेरे मन में नफरत नहीं पनपी?
जिसे साडी दुनिया छलिया कहती
क्या तुझे नहीं लगा ?उसने तेरे साथ छल किया
तेरे मुख उसके लिए कड़वे वचन नहीं उगली
तू कैसे सदा उसे प्यार करती रही
उसके झुठे अस्वासन पे
उसका इंतजार करती रही
आखिर तुमने क्या पाया? हमें बताओ,
हे राधे अपनी व्यथा सुनाओ।
तुमने क्यों ना इंतजार करना छोड़ दिया                                                      
क्यों न सारे वचनों को तोड़ दिया
क्यों उस झूठे का वचन निभाया
आखिर तुमने क्या पाया?हमें बताओ,
हे राधे अपनी व्यथा सुनाओ।
अगर मै दुनिया  की मानु
कृष्ण में सारे अवगुण भरे थे
तुमने कैसे उसमे गुण ढूंढ़ निकला
जो उसके मोह में तुझे जकड़े थे
आखिर तुमने क्या पाया? हमें बताओ,
हे राधे अपनी व्यथा सुनाओ।
आज भी तो तुम जैसी राधा है
मुझ जैसे कृष है
परन्तु अब वो मेरा इंतजार नहीं करती
किसी और के दामन को थाम
जीवन की नई सफ़र शुरु करती है
आखिर तूने ऐसा क्यों गजब कर डाला
आखिर तुमने क्या  पाया? हमें बताओ,
हे राधे अपनी व्यथा सुनाओ।
मत कहना आज की राधा
कृष्ण से प्यार नहीं करती
अगर वो तुझ सा करती
कब का मिट चुकी होती
आखिर तूने ऐसा क्यों आदर्श बना डाला
आखिर तुमने क्या पाया? हमें बताओ,
हे राधे अपनी व्यथा सुनाओ।
तू भी आज की राधा बन सकती थी
मना तू कृष्ण से प्यार करती थी
पर तूने कृष्ण को नीचा दिखाया
आखिर तुमने क्या  पाया? हमें बताओ,
हे राधे अपनी व्यथा सुनाओ।
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11/01/2012

मुस्कुराहट का आंचल

सुंदर तन सुन्दर मन 
और तो और 
ओढ़ ली हो जैसे 
मुस्कुराहट का आंचल 
लगती हो कोई परी 
आखें खुली हो या बंद
मिलती रहती हो  हर कहीं 
ऐसा लगता है तुम हो हकीकत 
चाहता हु जब स्पर्श तेरा 
बदल लेती हो अपना बसेरा  
तुम क्या हो समझ नही पता हूँ  
हो हकीकत या कोई परी 
रास्ते तो बहुत है 
 तेरे पास पहुचने का 
तेरे पास पहुँचता हूँ वैसे 
जैसे सीसे के उस पार तुम हो 
इस पर मै खड़ा  हूँ  
देखता हूँ तुमको टकटकी लगा 
बोलना चाहता हूँ  
मै  हूँ  अधुरा 
तुझे मेरे हिलते होठ दिखते  होंगे 
मेरे शब्द तेरे कानों तक पहुचने से पहले 
दम तोड़ देते हैं 
मेरी बेबसी पर ततछन
ओढ़ लेती हो तुम 
मुस्कुराहट  का आंचल 
मै हो जाता हूँ  पूरा .
   


6/13/2012

" अर्थ का करिश्मा "


मन के अंधेरे में हे इंसान 
          तू भटक रहा अर्थ में 
लालच का प्रतिफल है 
        तू भटक रहा जीवन में 
इर्ष्या और द्वंद में 
       तू भटक रहा जीवन -मरण में 
हर पल खुद में  उलझा है 
     तू भटक रहा आने वाले पल में 
जो भी तू देखता है,तू उसे तौलता है 
     तू भटक रहा सही और गलत में  
 तू आनन्द कहाँ ले पता है 
     तू भटक रहा मिले गम से लड़ने में 
परमात्मा को छोड़ चूका है  
     तू भटक रहा अपने अंतर में 
खरीद रहा है तू प्रेम 
    तू भटक रहा है सुन्दरता के भंबर में    
तेरे अर्थ का करिश्मा है 
      तू भटक रहा आत्मा बेचने व 
                     खरीदने के चक्र में 
 मन के अंधेरे में हे इंसान 
           तू भटक रहा अर्थ में 
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5/15/2012

"अन्जान मोहब्बत "


ये प्यार की लहरें 
यूँ ही न  बिखर जाएँ 
चट्टनों  से टकरा  कर 
सागर से पहले न  दम  तोड़ जाएँ 
अंजान  मोहब्बत और मै  अदना  सा 
कातिल  उनकी निगाहें और मै  सहमा सा 

कभी नजरें चुराता कभी खुद को छुपता 
चला मै  अपने धुन  में 
अंजान - अंजान मै सहमा सा 
अपनी निगाहों से  चलता उसे  घेरे 
कहीं जादू कोई चल  जाये ,
वो मरे प्यार में पड़ जाये   

दिल में लिए अरमान 
मै   प्यार में नादान 
कैसे उसको रिझाऊं 
कैसे उसको बेचैन कर जाऊं 
अपनी निगाहें से वो मुझे हटने ना  दे
ऐसे वो मुझे  अपनी निगाहों से घेरे 

प्यार में बेचैन मै
खुद  को  कहीं प्यार ना  कर पाऊं  
खुद को कर बदनाम  मै  
उसको कहीं खो ना जाऊं 
अंजान मोहब्बत   और मै  अदना  सा 
कातिल  उनकी निगाहें और मै  सहमा सा 

 मै नादान  चला करने प्यार का इजहार 
उन्होंने भी बड़े अदब से किया इंकार 
टूटे दिल और मंद -मंद मुस्कान लिए सोचता हुआ लौटा 
दुःख  किसका ,  टूटे दिल  या इंकार का 
हुई पहचान मोहब्बत  से और मै उलझा सा 
कातिल  उनकी निगाहें और मै अपने धुन  में  खोया-खोया सा  .


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5/14/2012

"हम सब चोर हैं" (ख़ुद क़े खिलाफ बगाबत य़ा सच )


अन्ना ने जब लोकपाल माँगा
हम ने उन्हें खूब सराहा
सभी लेकर निकल पड़े झंडे 
हम भी अन्शन करेंगे,खायेंगे डंडे
यूँ भी हम रोज मरते हैं 
भूखे रह कर  अन्शन ही करते हैं
दिल्ली जाकर अन्ना के अन्शन  को बल देंगे
भारत को क्रप्शन मुक्त करेंगे
लगा क्रप्शन को उखड कर ही दम लेंगे  
न्याय-नीति की बात करने वाले
मिड-डे-मील चुराने वाले अध्यापक हो
प्रोक्सी लगा कर बंक मरने वाले,
एग्जाम की रात पड़ने वाले विद्यार्थीगन
सभी  ने जोर लगाया
अपने दामन   पे लगे दाग निकलना चाहा

लोन पास करने के लिए 10% लेने वाले बैंक अधिकारी हो
200  रूपये लेकर बर्थ देने वाले टीटी  हो
प्रक्टिकल में पैसे लेकर पास करते कोचिंग चलते  साइंस टीचर हो 
मोहर लगाने के लिए पैसे लेते चपरासी हो 
रोज न आने वाले बी.डी.ओ बाबु हो
ऑफिस का चाहे कोई बाबु हो 
सभी ने खूब जोर लगाया 
अपने दामन पे लगे दाग निकलना चाहा

जब भी कोई ऑफिस जाओ
साहब नहीं आये है कल आना का जुमला सुनो
रोज-रोज आने का क्या झंझट पालोगे 
जो पैसे भाड़े पे खर्च करोगे, मुझे दो
आपने परेशानी से बचो
साहब जब भी आयेंगे
हम तुम्हारा काम  करवाएंगे
अरे कुछ गलत भी होगा 
साहब को भी चना खिलाएंगे
आप निश्चिंत रहो,
घर पे जाओ, बच्चे के साथ समय बिताओ
ऑफिस के बाबु ने ऐसा समझाया 
हमारी भुझी बत्ती जल उठी
तब  हम न लड़े,अपनी परेशानी बचाई 
अपनी पीढ़ी को क्रप्शन की बीमारी दे डाली
अब  हमने भी खूब जोर लगाया
अपने दामन पे लगे दाग निकलना चाहा

अन्ना ने जब लोकपाल माँगा
तब लालू हो या मुलायम
राहुल हों या कपिल
सभी को तब संसद की मर्यादा  याद आया 
संसद में बैठ कर जो कल तक सोये थे
बेंच तोड़ रहे थे,एक दुसरे को गाली दे रहे थे
कोई संसद में बैठ पोर्न देख रहे थे 
तब ये अर्जुन ,ध्रितराष्ट्र बने रहे 
जब अन्ना ने लोकपाल  माँगा 
सब नींद से जग गए 
सब ने एक स्वर में कहा
हम कानून बनायेंगे,जनता दूर रहे
हम हैं खाए पीये
जनता तो  है भूखी नंगी 
वो जब कानून बनाएगी संसद मैली न हो जाएगी 
अन्ना ने जब लोकपाल माँगा
हम ने उन्हें खूब सराहा.

जब हमने संसद को चोर कहा
बल्त्कारी,धोखेबाज, घुसखोर  कहा  
सभी ने महसूस किया,कैसे वो बिदके 
चोर की दाढ़ी में तिनका सभी ने पढ़ा होगा 
जनता ने तब  महसूस किया
संसद में भाषण  गहराए
बहार वाले को लगता है 
अन्दर सभी बुरे बैठे हैं
माना आप ईमानदार  हो
आपने न कुछ बुरा देखा 
आपने न कुछ बुरा सुना
आपने न कुछ बुरा बोला
आप गाँधी के तीनो बन्दर बने रहे
गाँधी को भूल गए 
आपके साथी नेता खाते रहे 
आप मन बहलाते रहे 
आपनी पार्टी के टिकट  पर
क्रिमनल,बल्त्कारी,खुनी
दबंग  को संसद में लाते रहे
सच तो यही है सांसद  चोर है
संसद मर्यादाविहीन है

अन्ना ने जब लोकपाल माँगा
तब  भाजपा हो,चाहे कांग्रेस 
चाहे गली छाप  राजनितिक  पार्टी हो
सभी ने खुद को पवित्र बताया 
जनता बहकावे में है
अन्ना और उनके साथी में वो दम कहाँ
हम कानून बनायेंगे
अन्ना जैसे लोगों पर 
संसद की मर्यादा पे नोटिश  भिजवायेंगें 
संसद अपना काम  अपने तरीके से करेगी
महिला बिल लटकी रहेगी 
संसद  सांसदों का  वेतन बढाने की कानून घंटे में पास करेगी
लोकपाल को सालों टला 
इस बार भी टालेंगे
हम मजबूत लोकपाल लायेंगे
वादा ही तो करना है,वादा कारने में हम  माहिर है
जनता रोजी- रोटी में उलझी थी
फिर उलझ जाएगी
संसद मजबूत लोकपाल लाएगी
अन्ना ने जब लोकपाल माँगा
हम ने उन्हें खूब सराहा

अगर देखें सभी अपने अंतर में 
खुद में एक करप्ट को पाएंगे
और करप्ट क्या मजबूत लोकपाल लायेंगे
कैसे कैसे चोरी किया आपने 
खुद ये समझ जाओगे
खुद को तब किस जेल में डालोगे 
हम चोर है,हम चोर हैं
ये नारे क्या खुद के खिलाफ लगा पाओगे
हम सभी चोर हैं
सच यदपि  कहना पड़े
खुद के खिलाफ यदि लड़ना पड़े
सच तो यही है,सभी रोटी खाने में ही जुटे रहे
देश को भ्रष्ठ हाथों  में छोड़ कर
रोजी कमाने में उलझे रहे
अन्ना ने जब लोकपाल माँगा
हम ने उन्हें खूब सराहा
सभी लेकर निकल पड़े झंडे 
हम भी अन्शन करेंगे,खायेंगे डंडे
यूँ भी हम रोज मरते हैं 
भूखे रह कर अन्शन  ही करते हैं
दिल्ली जाकर अन्ना के अन्शन  को बल देंगे
भारत को क्रप्सन मुक्त करेंगे  


Note-Part of artwork is borrowed from the internet ,with due thanks to the owner of the photographs/art